अमर बलिदानी दादा कुशाल सिंह दहिया

इस फरमान से पूरे देश में दहशत फैल गई।लोग अपने-अपने घरों में छिप गए।मंदिरों की घंटियाँ खामोश हो गईं, और पंडितों के दिलों में डर घर कर गया।

सबसे ज़्यादा अत्याचार हुआ कश्मीर के पंडितों पर।उन्हें जबरदस्ती धर्म बदलने पर मजबूर किया जाने लगा।

जब वे गुरु जी के सामने पहुँचे, तो उनके नेता बोले —

“हे गुरु जी! धर्म संकट में है। औरंगज़ेब ने फरमान निकाला है कि सभी को इस्लाम कबूलना होगा, वरना सिर कलम कर दिया जाएगा।
अब हमें बस आपसे ही उम्मीद है।”

गुरु तेग बहादुर जी शांत भाव से उनकी बातें सुनते रहे।

“पिताजी, आपसे बड़ा कोई धर्मरक्षक नहीं जो दूसरों के धर्म की रक्षा के लिए अपना जीवन दे।”उन मासूम शब्दों ने जैसे ही हवा में गूंज मचाई, वातावरण बदल गया।
गुरु तेग बहादुर जी के चेहरे पर तेज़ और संतोष का मिश्रण झलकने लगा।
उन्होंने शांत स्वर में कहा

“बेटा, तूने आज धर्म का सच्चा अर्थ समझाया है।
अब मैं तैयार हूं — धर्म की रक्षा के लिए अपना शीश न्योछावर करने को
।”

गुरु तेग बहादुर जी ने जब धर्म की रक्षा के लिए अपने शीश का बलिदान देने का निश्चय किया, तो आनंदपुर साहिब का वातावरण गंभीर और भावनात्मक हो गया।

गुरु जी ने अपने छोटे पुत्र गुरु गोविंद राय (जो उस समय मात्र 9 वर्ष के थे) को आशीर्वाद दिया और कहा — “बेटा, धर्म की रक्षा के लिए सत्य के मार्ग पर अडिग रहना, अन्याय के सामने सिर झुकाना नहीं।

”गुरु गोविंद राय ने पिता के चरणों को छूकर प्रणाम किया।गुरु जी ने कुछ शिष्यों के साथ दिल्ली की ओर कूच किया, जहाँ औरंगज़ेब की दरबार में उन्हें बंदी बनाया जाना था।

गुरु जी के प्रस्थान के समय पूरा आनंदपुर साहिब अश्रुपूर्ण हो उठा,
लोग झोली फैलाकर आशीर्वाद ले रहे थे, और आसमान में “सत नाम श्री वाहेगुरु” की गूंज थी।

गुरु तेग बहादुर जी दिल्ली पहुंचे। वहां औरंगज़ेब का भव्य दरबार लगा हुआ था — जहाँ तलवारें चमक रही थीं, सैनिकों की कतारें थीं, और बीच में बैठा था औरंगज़ेब — घमंड से भरा हुआ। गुरु जी को जंजीरों में बाँधकर दरबार में लाया गया। परंतु उनके चेहरे पर न भय था, न क्रोध — केवल शांति और तेज़। औरंगज़ेब ने कहा

इस्लाम कबूल कर लो, वरना मौत को तैयार रहो।

गुरु तेग बहादुर जी मुस्कुराए और शांत स्वर में बोले — “जिस धर्म की रक्षा के लिए मैं आया हूं, उस धर्म को छोड़ने का विचार भी मेरे मन में नहीं।”

उन्हें दिल्ली लाया गया और गुरु जी के सामने अत्याचार किए गए,
ताकि वे डर जाएं और धर्म परिवर्तन स्वीकार कर लें।
परंतु तीनों ने दृढ़ता से कहा —“हम अपने गुरु के साथ हैं, धर्म नहीं छोड़ेंगे।”मुगलों ने उन्हें भयानक यातनाएँ दीं

भाई मति दास को आरी से चीर दिया गया,भाई सती दास को रूई में लपेटकर आग में जला दिया गया,और भाई दयाला जी को खौलते पानी में उबाल दिया गया।

दिल्ली का चांदनी चौक, सुबह का समय।मुगल सैनिक चारों ओर खड़े हैं, तलवारें चमक रही हैं। गुरु तेग बहादुर जी को लोहे की जंजीरों में बांधा गया है, पर उनके चेहरे पर कोई भय नहीं — बस शांत तेज़ और दिव्यता।

एक मुगल सेनापति कठोर स्वर में कहता है — “इस्लाम कबूल कर लो, नहीं तो सिर कलम कर दिया जाएगा।”

गुरु जी मुस्कुराते हुए कहते हैं — “धर्म तलवार से नहीं, आत्मा की स्वतंत्रता से जीवित रहता है।”

दिल्ली का चांदनी चौक पर खुले सूरज की रोशनी फीकी पड़ चुकी थी।
गुरु तेग बहादुर जी शांत मुद्रा में बैठे हैं, हाथ जोड़े हुए, आँखें बंद।
उनके चारों ओर मुगल सैनिक तलवारें थामे खड़े थे।

भीड़ स्तब्ध खड़ी है — किसी की सांस नहीं निकल रही।कुछ सिख और हिन्दू आंसू रोक नहीं पा रहे थे लेकिन गुरु जी के चेहरे पर अब भी दिव्यता और शांति थी — जैसे वे पहले ही संसार से ऊपर उठ चुके हों।

अचानक तलवार चलती है और क्षण भर में गुरु तेग बहादुर जी का शीश धड़ से अलग हो जाता है।धरती हिल उठती है,आसमान में बिजली चमकती है और हवा में “सत नाम श्री वाहेगुरु” की गूंज फैल जाती है।

दिल्ली की उस भूमि पर जहाँ अत्याचार की तलवारें लहराई थीं,वहीं आज भी गुरु तेग बहादुर जी का त्याग अमर है।उनका बलिदान केवल धर्म की रक्षा नहीं,बल्कि मानवता के अधिकारों की रक्षा का प्रतीक बन गया।

दिल्ली के बलिदान के बाद अंधेरी रात होने लगी, तेज तुफान चलने लगा। आसमान में बिजली चमक रही थी मुगल सैनिक भगदड़ में इधर-उधर दौड़ रहे थे।

इसी अफरातफरी में लख्खी बंजारा, जो गुरु तेग बहादुर जी के बहादुर भक्त थे, और रूई और मसालों के व्यापारी थे, अपने ऊँट-गाड़ियों के काफ़िले के साथ पास में थे। जैसे ही उन्होंने देखा कि गुरु जी का धड़ वहीं पड़ा है, उन्होंने तुरंत अपनी गाड़ी में रखे रूई के बोरे हटाए, धड़ को श्रद्धा से उठाकर उन बोरों के नीचे सुरक्षित रख दिया।

चेहरे पर साहस, आँखों में आँसू,
और होंठों पर बस “वाहेगुरु” का नाम।

रात का समय था… दिल्ली की गलियाँ सन्नाटे में डूबी थीं। चारों ओर मुग़ल सैनिकों का पहरा था।यहीं, रकाबगंज क्षेत्र में, लख्खी बंजारा अपने घर के भीतरगुरु तेग बहादुर जी के धड़ का अंतिम संस्कार करने की तैयारी में था।उन्होंने अपनी पत्नी और बेटे को देखा,उनके चेहरों पर भय नहीं, बल्कि भक्ति और निश्चय का तेज़ था।


लख्खी ने प्रण किया —“यदि धर्म की रक्षा के लिए गुरु अपना शीश दे सकते हैं,
तो मैं भी अपने घर और जीवन को इस बलिदान का साक्षी बनाऊंगा।फिर उन्होंने अपने घर में स्वयं आग लगा दी।लपटें धीरे-धीरे आसमान को छूने लगीं।लकड़ी और दीवारें धधकने लगीं, पर भीतर से भक्ति की आवाज़ आई —“वाहेगुरु… वाहेगुरु…”

मुगल सैनिक अपने घोड़ों पर घर के बाहर खड़े रह गए और किसी में अंदर जाने का साहस नहीं था। उनकी आँखों में भय और आश्चर्य था।सामने पूरा घर आग में समा रहा था, और लख्खी का परिवार उसी अग्नि में अमरत्व पा रहा था।कहा जाता है कि अगली सुबह जब राख ठंडी हुई,वहीं से गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब का इतिहास आरंभ हुआ

उधर दिल्ली में रात के अंधेरे में तूफ़ान के बीच भाई जैता सिंह गुरु तेग बहादुर जी का शीश एक चद्दर में लपेटकर अपने सीने लगाते हैं और शीश को आनंदपुर साहिब तक सुरक्षित पहुंचाने का प्रण लेते हैं।

आसमान में बिजली कड़क रही थी और भाई जैता सिंह नीले वस्त्रों में, अपनी बाँहों में गुरु तेग बहादुर जी का पवित्र शीश लेकर चल देते हैं।

उनके चेहरे पर आँसू हैं, पर मन में अटूट साहस और श्रद्धा। वो धीरे-धीरे दिल्ली की गलियों से निकल रहे हैं।कभी किसी मोड़ पर छिपते, कभी अंधेरे में खो जाते।

पीछे से मुगल सैनिकों के मशालें लिए घोड़े दौड़ाते हुए आते हैं,
पर तूफ़ान से बुझे रास्तों में वे जैता तक नहीं पहुँच पाते।

कई मीलों की यात्रा के बाद, वे हरियाणा की धरती पर गढ़ी कुशाली गांव पहुँचे, जिसे बाद में बढ़खालसा कहा जाने लगा।

यह गांव नाहरी गांव से आए बुजुर्गों ने बसाया था, और गांव के प्रमुख एवं साहसी व्यक्ति दादा कुशाल सिंह दहिया इस गांव के रक्षक और मार्गदर्शक माने जाते थे।

गांव के रखवाले ने जब अजनबी जैता सिंह को देखा तो दौड़कर अंदर सूचना दी,
“दादा कुशाल सिंह, बाहर कोई सिख वीर खड़ा है, लगता है बहुत दूर से आया है।”

दादा कुशाल सिंह दहिया जी, जो गांव के बुजुर्ग और सबके मार्गदर्शक थे,
अपने सफेद वस्त्रों में बाहर आए। जैसे ही उन्होंने जैता जी को देखा, उन्होंने धीमे स्वर में कहा-“बेटा, कौन हो तुम? और इस अंधेरी रात में यहाँ तक कैसे पहुँचे?”

समय — भोर का था। आसमान पर हल्की लालिमा फैल रही थी, और गढ़ी कुशाली (अब बढ़खालसा) गांव में एक विचित्र शांति थी। रातभर गांववाले इस सोच में थे कि मुगल सेना किसी भी क्षण गांव पर धावा बोल सकती है, क्योंकि उन्हें खबर मिल चुकी थी कि भाई जैता जी गुरु तेग बहादुर जी का शीश लेकर यहीं से गुज़रे हैं।

गांव की चौपाल में दादा कुशाल सिंह खड़े होकर बोलते हैं, उनके चेहरे पर गहरी शांति थी, आँखों में तेज़, और आवाज़ में दृढ़ता। सामने गांव के बुजुर्ग, नौजवान और महिलाएँ खड़ी थीं — सभी चिंतित, पर श्रद्धा से भरे।

उन्होंने सबकी ओर देखा और कहा —

गांव में सन्नाटा छा गया।कई लोगों की आँखों से आँसू बहने लगे।फिर दादा जी ने अपनी तलवार उठाई, उसकी धार भोर की लालिमा में चमक रही थी।
उन्होंने शांत स्वर में आगे कहा —

“अगर मुगल सेना को भ्रमित करने से
गुरु जी का शीश सुरक्षित रह सकता है, तो मेरा शीश ही उनका ध्यान भटकाएगा। यह गांव, यह धरती — अब धर्म की ढाल बनेगी।

फिर उन्होंने आसमान की ओर देखा, दोनों हाथ जोड़कर बोले —

वाहेगुरु, मेरा शीश धर्म की रक्षा में स्वीकार करो।”

दादा कुशाल सिंह जी की तलवार भोर की लालिमा में चमक उठी।गांव के लोगों ने श्रद्धा से देखा — किसी ने हाथ जोड़ लिए, तो कोई धरती पर सिर झुकाए सिसकने लगा।

फिर एक क्षण ऐसा आया — जब पूरा वातावरण थम गया। हवा रुक गई, पत्ते स्थिर हो गए। दादा जी ने “वाहेगुरु” का नाम लिया और उसी क्षण उन्होंने अपनी तलवार स्वयं अपने गले पर चला दी।गांव के लोग दौड़े,किसी ने उनके शीश को गोद में लिया, किसी ने आंसुओं से उनके चरणों की धूल भिगो दी।हर चेहरे पर दर्द था, पर उस दर्द के पार गर्व और श्रद्धा की लहर उठ रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे धरती भी इस बलिदान को नमन कर रही हो

भाई जैता जी आगे बढ़े — उनकी आंखें नम थीं, पर आवाज में विश्वास था।

दादा कुशाल सिंह के शीश बलिदान के बाद गांव के लोगों ने उसी क्षण एक अद्भुत योजना बनाई

गुरु गोबिंद सिंह जी का शीश सुरक्षित रूप से भाई जैता जी के माध्यम से आनंदपुर साहिब की ओर रवाना किया गया और साथ ही दादा कुशाल सिंह का शीश एक कपड़े में लपेटकर,गांव के कुछ बुजुर्ग और निहत्थे ग्रामीणों ने दिल्ली की ओर यात्रा प्रारंभ की।

धूल भरी राहों पर सफेद वस्त्रों में लिपटे बुजुर्ग धीमे कदमों से चल रहे थे।
उनके हाथों में लिपटा वह “शीश” मानो प्रकाश फैला रहा था —


मुगल सैनिक दूर से देखकर यही समझ बैठे कि वही शीश है जिसे वे ढूंढ रहे हैं।

उनमें से एक ने अपने हाथों में कपड़े में लिपटा शीश संभाल रखा था।
वह शीश था — दादा कुशाल सिंह दहिया का,जिसे गांव वालों ने गुरु गोबिंद सिंह जी के शीश के रूप में प्रस्तुत किया था,ताकि असली शीश को सुरक्षित मार्ग मिल सके।

मुगल सेनापति ने कठोर स्वर में पूछा,

यही है गुरु का शीश?”

गांव के बुजुर्गों ने सिर झुका लिया —किसी ने कुछ नहीं कहा, पर उनके मौन में सत्य छिपा था।सैनिकों ने बिना और सवाल किए वह शीश छीन लिया।गांव वाले निःशब्द रह गए, पर उनके हृदय में संतोष था —
क्योंकि वे जानते थे कि उनका छल धर्म की रक्षा के लिए था, न कि भय से

दिल्ली का दरबार सन्नाटे में डूबा था।सोने की कुर्सी पर बैठा औरंगज़ेब गर्व से भरा हुआ था।दरबारियों की पंक्ति सजी थी — तलवारें चमक रही थीं और बाहर सैनिकों की टापों की गूंज थी।

औरंगज़ेब ने तिरछी नज़र से देखा —कपड़ा हटाने का इशारा किया।जैसे ही कपड़ा थोड़ा खुला, उस क्षण औरंगज़ेब का चेहरा लाल पड़ गया।उसके भीतर का अहंकार, क्रोध और भय सब एक साथ उमड़ पड़े।वह चिल्लाया

यह क्या है? यह चेहरा… यह तो कोई और है!”

सूर्यास्त का समय था। पहाड़ों के पीछे डूबते सूरज की किरणें आकाश को सुनहरा रंग दे रही थीं।हवा में हल्की ठंडक थी, पर हर सांस में श्रद्धा की गर्मी थी।

भाई जैता सिंह, नीली पोशाक में, दृढ़ कदमों से आगे बढ़ रहे थे।उनकी बाँहों में सफेद कपड़े में लिपटा हुआ गुरु तेग बहादुर जी का शीश था —जो स्वयं धर्म, साहस और बलिदान का प्रतीक बन चुका था।

उनके चेहरे पर थकान नहीं, प्रकाश था।आंखों में नमी नहीं, बल्कि दिव्यता की चमक थी।पीछे कुछ साथी धीरे-धीरे चल रहे थे —हर कदम के साथ उनके होंठों पर “वाहे गुरु” की ध्वनि गूंज रही थी।

आनंदपुर साहिब की पावन भूमि पर सूर्य ढल रहा था।आकाश में सुनहरी आभा थी, मानो प्रकृति भी इस अद्भुत मिलन की साक्षी बनना चाहती हो।

भाई जैता सिंह, कई दिनों की कठिन यात्रा, रक्त और तप के बाद गुरु तेग बहादुर जी का शीश अपने हाथों में लिए पहुंचे।धूल से लथपथ वस्त्र, पर चेहरे पर दिव्य तेज़ था।आगे बाल रूप में बैठे गुरु गोबिंद सिंह जी गंभीर और शांत नेत्रों से उस शीश को देख रहे थे।उनके चारों ओर संगत मौन थी — हवा तक ठहर गई थी।

भाई जैता सिंह ने दोनों हाथों से शीश उठाया,उनकी आँखों से अश्रु बह रहे थे — पर वह आँसू गर्व के थे, दुःख के नहीं।उन्होंने शीश गुरु गोबिंद सिंह जी के चरणों में रखते हुए कहा —“हे साहिबज़ादे, यह आपके पिता, हमारे धर्म रक्षक गुरु तेग बहादुर जी का शीश है।”

गुरु गोबिंद सिंह जी ने धीरे से अपना हाथ शीश पर रखा,
और बोले — “भाई जैता, आज से तुम केवल जैता नहीं —‘जीवन सिंह’ हो। तुमने धर्म को जीवन दिया है।”

उस क्षण समूचा आनंदपुर साहिब प्रकाश से भर उठा। संगत के होंठों से “वाहे गुरु, वाहे गुरु” की गूंज उठी।किसी ने आकाश की ओर देखा तो लगा, जैसे स्वयं गुरु तेग बहादुर जीआसमान से आशीर्वाद दे रहे हों।

भाई जैता सिंह नतमस्तक हुए —
उनकी आत्मा को संतोष था कि उन्होंने गुरु की मर्यादा निभाई और औरंगज़ेब के अत्याचार पर सत्य की विजय स्थापित की।यह केवल इतिहास नहीं, बल्कि श्रद्धा की पराकाष्ठा थी।